नई दिल्ली: जायद सीजन के दौरान तरबूज और खीरा जैसी बेल वाली फसलें अपने विकास और फल बनने के महत्वपूर्ण चरण में होती हैं। अप्रैल और मई के महीनों में इन फसलों की बुवाई और पौधों की स्थापना का कार्य अधिकांश किसानों द्वारा पूरा कर लिया जाता है। इस समय बढ़ती गर्मी, हीटवेव, कीटों का प्रकोप और फफूंदी जनित रोग फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उचित प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इसी दिशा में धानुका एग्रीटेक ने किसानों को कुछ महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सुझाव दिए हैं।

तरबूज और खीरा उच्च मूल्य वाली और संवेदनशील फसलें मानी जाती हैं। इसलिए इनकी खेती में सिंचाई, पोषण और कीट प्रबंधन में थोड़ी-सी भी लापरवाही उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार किसानों को अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी का चयन करना चाहिए और स्वस्थ तथा प्रमाणित बीज का उपयोग करना चाहिए, जिससे पौधों की प्रारंभिक वृद्धि मजबूत हो सके।

फसल के विकास के दौरान पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। विशेष रूप से पोटाश (K), कैल्शियम (Ca) और बोरॉन (B) जैसे तत्वों की कमी से फलों का आकार छोटा रह सकता है, फल फटने की समस्या हो सकती है और गुणवत्ता में गिरावट आती है। पोटाश पौधों की जल संतुलन क्षमता को बढ़ाता है और हीट स्ट्रेस से बचाव में सहायक होता है। वहीं कैल्शियम फल की मजबूती और गुणवत्ता को बेहतर बनाता है। बोरॉन फूल से फल बनने की प्रक्रिया को सुधारता है और फल सेटिंग को बढ़ाता है। इसलिए संतुलित पोषण प्रबंधन के तहत इन पोषक तत्वों का समय पर प्रयोग करना आवश्यक है।

गर्मी के मौसम में कीटों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ता है। एफिड्स, व्हाइटफ्लाई और फल मक्खी जैसे कीट पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और फल की गुणवत्ता घटती है। इसके अलावा डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे फफूंदी रोग पत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है और उत्पादन में कमी आ सकती है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इन समस्याओं से बचाव के लिए नियमित रूप से खेत की निगरानी करना और समय पर कीटनाशक तथा फफूंदनाशी का उपयोग करना जरूरी है। साथ ही एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों का उपयोग और विभिन्न प्रकार के ट्रैप्स लगाने से कीटों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

इसके अलावा गर्मी के मौसम में मिट्टी की नमी बनाए रखना भी बेहद जरूरी होता है। मल्चिंग तकनीक अपनाने से मिट्टी की नमी संरक्षित रहती है और खरपतवार की समस्या भी कम होती है। वहीं ड्रिप इरिगेशन प्रणाली के माध्यम से पौधों को निरंतर और नियंत्रित मात्रा में पानी मिलता है, जिससे हीटवेव का असर कम होता है और पौधों की वृद्धि बेहतर होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार अधिक सिंचाई से जड़ सड़न और रोगों का खतरा बढ़ सकता है, जबकि पानी की कमी से फल का विकास रुक सकता है। इसलिए किसानों को संतुलित सिंचाई अपनाकर मिट्टी में उचित नमी बनाए रखनी चाहिए और खेत में जलभराव से बचना चाहिए।

सही समय पर पोषण प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण और वैज्ञानिक खेती तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी तरबूज और खीरा फसल को सुरक्षित रख सकते हैं। इससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी बल्कि बेहतर गुणवत्ता के साथ अधिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।